कितना सफल होगा बंधन तोड़ अभियान, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बिहार सरकार की पहल

0
0

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हावभाव देखकर लगता है कि वह प्रशासन से ज्यादा समाज सुधार में दिलचस्पी ले रहे हैं। उनका मानना है कि समाज में सुधार आएगा तो सरकार को कम से कम काम करने की आवश्यकता पड़ेगी। यह विचार अच्छा है। इसकी सराहना भी की जानी चाहिए, लेकिन वह अपने समाज सुधारों को अक्सर ऊपर से जबरन थोपने का प्रयास करते हुए दिखते हैं और उत्साह के चलते अमूमन जमीनी सच्चाइयों को संज्ञान में नहीं लेते या अनदेखा कर देते हैं। इसकी वजह से उम्मीदों के मुताबिक उनकी मुहिम के नतीजे सामने नहीं आ पाते हैं। शराबबंदी की मुहिम में ऐसा ही देखने को मिला जहां समस्याएं दिन ब दिन बढ़ती ही चली जा रही हैं। नीतीश कुमार ने दहेज, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ कानूनी संघर्ष छेड़ा है, जिसके लिए बहुत पहले से ही कानून बने हुए हैं, लेकिन फिर भी देशभर में उन पर रोक नहीं लग पा रही है। इसलिए यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या नीतीश कुमार के नए प्रयास सफल होंगे या उनका हाल भी शराबबंदी जैसा ही होगा?

बहरहाल नीतीश कुमार की सरकार ने निर्णय लिया है कि जो सरकारी कर्मचारी दहेज व बाल विवाह को प्रोत्साहित करते हुए या इस प्रकार की मांग करते हुए पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इससे पहले गांधी जयंती के अवसर पर दो अक्टूबर को इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध अभियान छेड़ते हुए उन्होंने जनता से आग्रह किया था कि वह उन विवाह समारोह का बहिष्कार करें जिनमें दहेज लिया-दिया गया हो या बाल विवाह को प्रोत्साहित किया गया हो। बाद में समाज में जागृति बढ़ाने और किशोर लड़कियों को समय से मदद मुहैया कराने के लिए एक मोबाइल एप ‘बंधन तोड़’ भी लांच किया गया। नीतीश कुमार ने यह भी एलान किया है कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान में लोगों को जोड़ने को लेकर अगले साल 21 जनवरी को राज्य में एक मानव श्रृंखला का भी आयोजन किया जाएगा। इसी तरह इस साल जनवरी में शराबबंदी के खिलाफ भी आयोजन किया गया था।

पिछले साल अप्रैल में बिहार को शराब मुक्त बनाने के लिए नीतीश कुमार ने नए और सख्त नियम लागू किए थे। तब से राज्य में 70,000 से भी अधिक लोगों को अवैध तरीके से शराब पीने या उसका व्यापार करने के मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके अलावा अनेक लोग जहरीली शराब पीने से भी मरे हैं। हाल ही में सात लोगों की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई। इस मामले में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के एक पदाधिकारी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री ने संबंधित व्यक्ति को पहचानने से इन्कार कर दिया। मगर मीडिया में ऐसी कई तस्वीरें सामने आईं जिनमें वह आरोपी व्यक्ति नीतीश कुमार के बगल में बैठा हुआ दिख रहा है। सवाल उठता है कि नीतीश कुमार कैसे अपनी पार्टी के किसी पदाधिकारी को पहचान नहीं पा रहे हैं, जो उनके बगल में ही बैठा हुआ है। फिलहाल सरकारी सूत्रों का कहना है कि राज्य सरकार शराबबंदी के नए नियमों के तहत गिरफ्तार आरोपियों के लिए एक अलग जेल खोलने पर विचार कर रही है। अनुमान यह है कि सामाजिक कुरीतियों के ‘अपराधियों’ को भी इस नई जेल में ही रखा जाएगा। यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि गुजरात की तरह ही बिहार में भी देशी-विदेशी शराब अनेक जगहों पर उपलब्ध है। मगर रोजाना ही झारखंड, उत्तर प्रदेश व हरियाणा से बिहार जाने वाले शराब की बोतलों से भरे ट्रक व वैन पकड़े जा रहे हैं। शराबबंदी ने बेरोजगार युवकों और राजनीतिक रसूख वाले शराब माफियाओं को मोटी आमदनी कमाने का अवसर मुहैया करा दिया है। आर्थिक अपराध शाखा के एक अधिकारी का कहना है, स्थानीय स्तर पर पुलिस अधिकारी भी इस अवैध व्यापार से पैसा कमा रहे हैं। कुछ के खिलाफ कार्यवाही हुई है और बहुत से अन्य रडार पर हैं। जो लोग राज्य में महंगी विदेशी शराब नहीं खरीद पाते हैं वह अवैध भट्टियों पर तैयार शराब का सेवन करते हैं, जो कभी कभी जहरीली हो जाने के कारण मौत व अंधेपन की वजह बनती है।

इसके बावजूद नीतीश कुमार शराबबंदी को राज्य में जबरदस्त सफल प्रयोग मानते हैं, जिससे तमाम घरों में खुशहाली का माहौल है। अपनी इसी ‘सफलता’ से प्रेरित होकर उन्होंने अब अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ पिछले 2 अक्टूबर से अभियान छेड़ा है। इसके लिए बिहार महिला विकास निगम को नोडल संगठन बनाया गया है, जिसकी जिम्मेदारी इन योजनाओं को लागू करने की है। निगम के अधिकारियों का कहना है कि जो पुजारी या अन्य धर्मगुरु बाल विवाह कराते पकड़े गए उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। बैंक्वेट हॉल और होटलों के प्रबंधकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जगह पर जो विवाह संपन्न हो रहा है या हुआ है उसमें दहेज का लेन-देन तो नहीं हुआ। सुनिश्चित न करने पर या दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ भी दंडात्मक कार्यवाही होगी।

1जिन सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों के खिलाफ यह शिकायत मिलेगी कि वह दहेज ले रहे हैं या बाल विवाह को प्रोत्साहित कर रहे हैं और जांच में वह दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा। हर स्तर पर यह अभियान सुचारू रूप से चले, इसके लिए निगम की यह भी जिम्मेदारी है कि विभिन्न विभागों और जिला प्रशासनों को दिशा निर्देश भेजें, लेकिन राज्य में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जिनका मानना है कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ इस अभियान का भी वही हाल होगा जो शराबबंदी का हुआ है। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ पहले से ही कानून हैं और सुधार कार्यक्रम भी लंबे समय से पूरे देश में ही चल रहे हैं, लेकिन कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है। शिक्षा व आत्मजागृति से बाल विवाह में तो कमी आई है, लेकिन यही बात दहेज प्रथा के संदर्भ में नहीं कही जा सकती, जिसे रोकने के लिए देश में 1960 के दशक से कानून है, लेकिन दहेज के बिना विवाह के मामलों को कश्मीर से कन्याकुमारी तक उंगलियों पर गिना जा सकता है। यह कैसे साबित किया जा सकता है कि दहेज लिया गया है, जब तक कि दुल्हन या उसके परिवार के सदस्य शिकायत न करें?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here