स्ट्रोक से बचाव मुश्किल नहीं, पढ़ें क्या हैं लक्षण

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मस्तिष्क की लाखों कोशिकाओं की जरूरत को पूरा करने के लिए कई रक्त कोशिकाएं हृदय से मस्तिष्क तक लगातार रक्त पहुंचाती रहती हैं। जब रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है, तब मस्तिष्क की कोशिकाएं मृत होने लगती हैं। इसका परिणाम होता है दिमागी दौरा या ब्रेन स्ट्रोक। यह मस्तिष्क में ब्लड क्लॉट बनने या ब्लीडिंग होने से भी हो सकता है। रक्त संचरण में रुकावट आने से कुछ ही समय में मस्तिष्क की कोशिकाएं मृत होने लगती हैं, क्योंकि उन्हें ऑक्सीजन की जरूरी आपूर्ति नहीं हो पाती। जब मस्तिष्क की रक्त पहुंचाने वाली नलिकाएं फट जाती हैं तो इसे ब्रेन हैमरेज कहते हैं। कई बार ब्रेन स्ट्रोक जानलेवा भी हो सकता है। इसे ब्रेन अटैक भी कहते हैं।

क्या हैं लक्षण
इसके लक्षण अलग-अलग लोगों में अलग-अलग होते हैं। कई मामलों में तो मरीज को पता ही नहीं चलता कि वह ब्रेन स्ट्रोक का शिकार हुआ है। इन्हीं लक्षणों के आधार पर डॉक्टर पता लगाते हैं कि स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क का कौन-सा भाग क्षतिग्रस्त हुआ है। अकसर इसके लक्षण अचानक दिखाई देते हैं।
0 अचानक संवेदनशून्य हो जाना या चेहरे, हाथ-पैर में, विशेष रूप से शरीर के एक भाग में कमजोरी आना।
0 मांसपेशियों का विकृत हो जाना।
0 समझने या बोलने में मुश्किल होना।
0 एक या दोनों आंखों की क्षमता प्रभावित होना।
0 चलने में मुश्किल आना, चक्कर आना, संतुलन की कमी हो जाना।
0 अचानक गंभीर सिरदर्द होना।
0 फेस ड्रूपिंग यानी चेहरे का एक ओर झुक जाना या सुन्न हो जाना।
0 हाथों का सुन्न हो जाना या नीचे की ओर लटक जाना।

किन्हें होता है अधिक खतरा
0 टाइप-2 डाइबिटीज के मरीजों में इसका खतरा काफी बढ़ जाता है।
0 हाई ब्लड प्रेशर और हाइपरटेंशन के मरीज इसकी चपेट में जल्दी आ जाते हैं।
0 मोटापा ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण बन सकता है।
0 धूम्रपान, शराब और गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन ब्रेन अटैक को निमंत्रण देने वाले कारण माने जाते हैं।
0 कोलेस्ट्रॉल का बढ़ता स्तर और घटती शारीरिक सक्रियता भी इसका कारण बन सकती है।

कारण को जानें
मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण या उनके फट जाने के कारण ब्रेन अटैक होता है। इसके कारण नलिकाओं की दीवारों में वसा, संयोजी ऊतकों, क्लॉट, कैल्शियम या अन्य पदार्थों का जमाव हो जाता है। इस कारण नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे उनके द्वारा होने वाले रक्त संचरण में रुकावट आती है या नलिकाओं की दीवार कमजोर हो जाती है। इसके अलावा हृदय रोग, धूम्रपान, डाइबिटीज, शारीरिक सक्रियता की कमी और कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर इसके खतरे को बढ़ा देते हैं। आनुवंशिक कारणों से भी ब्रेन स्ट्रोक होने की आशंका तीन गुना तक बढ़ जाती है।

क्या हैं उपचार
लक्षण नजर आते ही मरीज को तुरंत हॉस्पिटल ले जाना चाहिए। प्राथमिक स्तर पर इसके उपचार में रक्त संचरण को सुचारू और सामान्य करने की कोशिश की जाती है, ताकि मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके। कई अत्याधुनिक हॉस्पिटलों में थ्रोम्बोलिसिस के अलावा एक और उपचार उपलब्ध है, जिसे सोनो थ्रोम्बोलिसिस कहते हैं। यह मस्तिष्क में मौजूद ब्लड क्लॉट को नष्ट करने का एक अल्ट्रा साउंड तरीका है। इस उपचार में दो घंटे लगते हैं। इसलिए स्ट्रोक अटैक के तीन घंटे के भीतर जो उपचार उपलब्ध कराया जाता है, उसे गोल्डन पीरियड कहते हैं।
इसके अलावा कुछ दवाओं द्वारा भी धमनियों के ब्लॉकेज को खोलने का प्रयास किया जाता है, लेकिन इन दवाओं को स्ट्रोक आने के 4-5 घंटे के भीतर ही दिया जाना चाहिए। उसके पश्चात यह कारगर नहीं होतीं । रक्त को पतला करने की दवाएं भी इसके उपचार का एक प्रमुख भाग हैं, लेकिन उन रोगियों में रक्त को पतला करने वाली दवाएं कारगर नहीं होतीं, जिनकी रक्त कोशिकाएं अत्यधिक संख्या में ब्लॉक हो जाती हैं। ऐसे मामलों में न्यूरोइंटरवेंशन तकनीक द्वारा रक्त के थक्के को निकालकर रक्त संचरण को पुन: प्रारंभ किया जाता है। उपचार के बाद भी आवश्यक सावधानियां बरतें, क्योंकि एक बार स्ट्रोक की चपेट में आने पर पुन: स्ट्रोक का हमला होने की आशंका पहले तीन महीनों में 20 प्रतिशत तक होती है।

सर्दियों में बढ़ जाता है खतरा
हालांकि सर्दियों में रक्तदाब के बढ़ने का वास्तविक कारण तो पता नहीं चल पाया है, लेकिन अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि सर्दियों में धमनियां सिकुड़ जाती हैं और रक्त गाढ़ा होने से शरीर में इसके संचरण के लिए इसे पंप करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इससे रक्तदाब बढ़ जाता है। इस मौसम में अपने शरीर को ऊनी और गर्म कपड़ों से ढककर स्ट्रोक की आशंका को कम कर सकते हैं। खिड़की-दरवाजे बंद रखें और पर्दे डालकर रखें, ताकि कमरे में गर्मी बनी रहे। कमरे का आदर्श तापमान 18 से 21 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। जिन्हें उच्च रक्तचाप है, सर्दियों में सुबह उनका रक्तदाब खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। इससे ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

बचाव के लिए है जरूरी
0 तनाव न लें, मानसिक शांति के लिए ध्यान करें।
0 धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें।
0 नियमित रूप से व्यायाम और योग करें।
0 अपना भार औसत से अधिक न बढ़ने दें।
0 हृदय रोगी और डाइबिटीज के रोगी सावधानी बरतें।
0 सोडियम का अधिक मात्रा में सेवन न करें।
0 गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन न करें, परिवार नियोजन के दूसरे तरीके अपनाएं।

अटैक आने पर क्या करें
रक्तदाब को नियंत्रित करने वाली दवा न लें। किसी न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाएं। मरीज को हॉस्पिटल ले जाने में देर न करें। तुरंत उपचार जरूरी है, क्योंकि स्ट्रोक आने के एक घंटे में मस्तिष्क काफी न्यूरॉन्स खो देता है।

पौष्टिक भोजन है कारगर
पोषक भोजन खाने से न सिर्फ मस्तिष्क की क्षतिग्रस्त हुई कोशिकाओं की मरम्मत होती है, बल्कि भविष्य में स्ट्रोक होने की आशंका भी कम हो जाती है। ऐसा भोजन लें, जिसमें नमक, कोलेस्ट्रॉल, ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट की मात्रा कम हो और एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन ई, सी और ए की मात्रा अधिक हो।
0 साबुत अनाज खाएं, क्योंकि यह फाइबर के अच्छे स्रोत हैं और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
0 अदरक का सेवन करें, क्योंकि इससे रक्त पतला रहता है और थक्का बनने की आशंका कम हो जाती है।
0 ओमेगा फैटी एसिड वाले खाद्य पदार्थ जैसे तैलीय मछलियां, अखरोट, सोयाबीन आदि को अपने खाने में शामिल करें।
0 जामुन, गाजर, टमाटर और गहरी हरी पत्तेदार सब्जियां जरूर खाएं।

(डॉ. मनीष वैश्य, एसोसिएट डायरेक्टर, न्यूरो सर्जरी विभाग, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली और डॉ. विपुल गुप्ता, निदेशक, न्यूरोइन्टरवेशनल सर्जरी, ऑर्टेमिस अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस, गुड़गांव से की गई बातचीत पर आधारित)

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